न मैं देह, न मैं मन, न स्मृति, न विचार का जाल,
मौन साक्षी शुद्ध चैतन्य, यही सत्य निष्कल काल।
जब-जब शांत हुआ अंतर, थमा वृत्तियों का स्पंदन,
तब-तब हृदय प्रकट हो उठता—नित्य सत्य मनमोहन॥

लक्ष्य-लिप्सा छूटे जब, बुझ जाए चाहत की प्यास,
मृगजल जैसे भंग हो जाए, मिटें भ्रम छाये प्रकाश।
जो स्वभाव से देख रहा है, नित्य अचल वह दर्शन,
वही अंतःस्थित तत्त्व अनादि—अमर रूप मनमोहन॥
अहंकार की उठती तरंगें, जब लय को प्राप्त हो जाएँ,
नाम-रूप के बंधन सारे, शून्य में विलीन हो जाएँ।
जहाँ न द्वैत, न कोई सीमा, न बंधन न ही मोचन,
वहीं मौन में प्रकट सत्य वह—अखंड ज्योति मनमोहन॥
बुद्धि रचे सुविधा की कथा, भय से बुनती दीवार,
सुरक्षा के इस घेरे में ही, बंधा हुआ व्यवहार।
जब देखो उसकी सीमाएँ, टूटे मिथ्या आवरण,
दृश्य-द्रष्टा एक हो जाएँ—शेष रहे मनमोहन॥
न वह दूर, न पास कहीं है, न ही कोई रूप-आकार,
हर अनुभव के पीछे बैठा, देखे जग का विस्तार।
जिसने भीतर झाँक लिया है, छोड़ दिया संशोधन,
उसके मौन हृदय में जागे—स्वयंसिद्ध मनमोहन॥
जब न कुछ पाने की इच्छा, न कुछ खोने का भय,
स्थित हो जाओ निज स्वरूप में, शांत, सरल, निर्वय।
न साधन, न साध्य वहाँ है, न पथ, न कोई गमन,
स्वतः प्रकाशित सत्य अनश्वर—परम तत्त्व मनमोहन॥
जो खोजे वह छूटेगा, जो छोड़े वह पाए,
जो “मैं” को थामे बैठा, वह सत्य न देख पाए।
जब “मैं” की धारा थमे, मिट जाए उसका आवरण,
तभी प्रकट होता मौन में—स्वरूप सत्य मनमोहन॥
ओम् सांब शिविर नमः