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हम वास्तव में वह हैं | मनमोहन पर आध्यात्मिक कविता | आत्मबोध और शांति

आध्यात्मिक कविता

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न माया जाल।
श्वास-श्वास मनमोहन, निर्मल चित्त विशाल॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न तृष्णा शोर।
मनमोहन रस बरसता, अंतर नाचे मोर॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न राग-विकार।
मनमोहन की ज्योति से, उज्ज्वल हर द्वार॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न द्वेष निवास।
मनमोहन मुस्कान सा, फैला मधुर प्रकाश॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न भय की रीत।
मनमोहन स्पर्श से, धड़कन गावे गीत॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न काल प्रहार।
मनमोहन स्मरण बने, अटल अमर आधार॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न छल का जाल।
मनमोहन सच्चाई बने, जीवन का सुरताल॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न दूरी भेद।
मनमोहन सबमें मिले, मिटें जगत के खेद॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न तम का मेल।
मनमोहन दीपक जले, बिन बाती बिन तेल॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न बंधन भार।
मनमोहन उन्मुक्त नभ, चेतन पंख पसार॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ न कोई अंत।
मनमोहन स्वर गूँजता, जैसे अनहद संत॥

हम वास्तव में वह हैं, जहाँ सहजता धाम।
मनमोहन हर श्वास में, प्रकटे निज परधाम॥

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